
डाम्ही गांव और मंदिर की प्रसिद्धि
डा. विजय कुमार सिंह
जकपुरधाम चैत २३ गते ।
महोत्तरी जिले के प्राचीन गांव डाम्ही-महेशपुर में स्थित अष्टभुजी दुर्गा विषहरा मंदिर एक आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थल है। डाम्ही की ख्याति कई कारणों से है, लेकिन इस मंदिर की उपस्थिति इसे एक विशेष गौरव प्रदान करती है। यह मंदिर छह दशक से भी अधिक पुराना है और इसका निर्माण कान्हवंशी राजपूतों द्वारा किया गया था।
कान्हवंशी राजपूतों का गौरवशाली इतिहास
कान्हवंशी राजपूतों की उत्पत्ति भारत के कानपुर (प्राचीन कान्हपुर) के चंदेल वंशी क्षत्रिय राजा कान्हदेव से मानी जाती है। यह वंश अपने साहस, वीरता और शासकीय परंपराओं के लिए जाना जाता है। 1857 की क्रांति में भाग लेने वाले इस वंश के दो भाइयों में से एक भूपसिंह नेपाल आए और डाम्ही-महेशपुर में बसकर इस गांव की नींव रखी।
मंदिर की स्थापना और प्रेरणा

इस मंदिर की स्थापना यदुनंदन सिंह और उनके चचेरे भाई भोला सिंह के नेतृत्व में हुई थी। कहा जाता है कि वि.सं. 2018 में नौ ग्रहों की अशुभ युति की भविष्यवाणी से लोगों में भय व्याप्त था। तभी माता गंगेश्वरी ने दर्शन देकर भय को दूर करने और मंदिर निर्माण की प्रेरणा दी। चार वर्षों के निर्माण उपरांत वि.सं. 2022 में मंदिर की स्थापना हुई।
देवमूर्ति और पूजन स्थल की विशेषताएं
मंदिर के गर्भगृह में सिंहवाहिनी अष्टभुजी भवानी गंगेश्वरी माता की प्रतिमा स्थित है, जो संगमरमर की बनी हुई और कोलकाता से मंगाई गई है। साथ ही मनसा देवी की नागमूर्ति, जया-विजया की प्रतिमाएं, और स्वयंभू शिवलिंग भी विराजमान हैं। गणेश और हनुमान जी की प्रतिमाएं वाराणसी से लाई गई थीं।
मंदिर परिसर की संरचना
मंदिर के दक्षिण में संकीर्तन मंडप, हवनकुंड और एक सुंदर सरोवर है जो भ्रमण-पथ और रेलिंग से युक्त है। उत्तर-पूर्व कोने में बलि स्तंभ है और उसके उत्तर में स्व. यदुनंदन सिंह और स्व. भोला सिंह की स्मृति में समाधि स्थल बने हुए हैं।
आवासीय और सामाजिक संरचनाएं
उत्तर दिशा में पुजारी आवास, पाकशाला और सात-बेड वाला सुसज्जित अतिथि गृह निर्मित है। साथ ही तीन अन्य आवासीय संरचनाएं भी हैं जो सत्संग, पूजन और सामाजिक कार्यों में उपयोगी होती हैं। विवाह, व्रतबंध जैसे संस्कार भी यहीं सम्पन्न होते हैं।
ऐतिहासिक: भूपकूप
डाम्ही गांव के संस्थापक भूपसिंह द्वारा निर्मित ऐतिहासिक कूप, भूपकूप आज भी विद्यमान है। इसका जल गंगाजल के समान निर्मल और ऊर्जावर्धक माना जाता है।
मंदिर संचालन और धार्मिक गतिविधियाँ
मंदिर की देखरेख श्री दुर्गा विषहरा मंदिर सेवा समिति और पूरे कान्हवंशी परिवार द्वारा की जाती है। डॉ. विजय कुमार सिंह इस समिति के वर्तमान अध्यक्ष हैं और मंदिर के आधुनिकीकरण एवं कार्यक्रमों में उनका योगदान सराहनीय है।
त्योहार और विशेष आयोजन
पौष १७ गते को ‘आध्यात्मिक दिवस’ से वार्षिक आयोजन आरंभ होते हैं। प्रमुख पर्वों में सरस्वती पूजा, स्थापना दिवस, महाशिवरात्रि, चैती व शारदीय नवरात्र, नागपंचमी, हनुमान जयंती शामिल हैं।
शारदीय नवरात्र: वर्ष का सबसे भव्य आयोजन

इस नवरात्र में घटस्थापना से विजयादशमी तक माता की विशेष आराधना की जाती है। महाष्टमी और महानवमी के दिन बलि प्रदान और कुमारी भोज का आयोजन होता है, जिसमें नौ कन्याओं और मनसा को देवी के स्वरूप में पूजकर भोजन कराया जाता है।
कान्हवंशी वंश और माता की कृपा
यह वंश अत्यंत शिक्षित, समृद्ध और भक्तिपरायण है। मान्यता है कि माता गंगेश्वरी की कृपा से ही इस वंश की सुख-समृद्धि बनी हुई है। माता के प्रति अटूट श्रद्धा ही इनके उन्नति का मूल है।

श्रद्धा, शक्ति और संस्कृति का केंद्र
डाम्ही गांव का यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक धरोहर भी है। यहाँ आकर श्रद्धालुजन अपने दुखों से मुक्ति और आध्यात्मिक शांति प्राप्त करते हैं। माँ गंगेश्वरी की कृपा अनुभूत की जाती है, कही नहीं जाती।
